हमारे आपके आस पास की बाते जो कभी गुदगुदाती तो कभी रूलाती हैं और कभी दिल करता है दे दनादन...

Wednesday, May 13, 2020

करोना का बाजार

फटे दुध से रसगुल्ला बना कर खाने वाली जमात सक्रिय हैं
, हर तरफ अवसरवादी लगें हैं तमाम टीवी विज्ञापनों में करोना का नाम लिया जा रहा हैं , झाड़ू से अगरबत्ती तक सब में करोना के लिऐ अदम्य मारक शक्ति का बखान हो रहा हैं , तमाम माडल कलाकार जिंगल में करोना पर जीत की बातें कर रहे हैं ,लगभग हर दिन समाचार चैनल करोना पर वैक्सीन बनाने , प्रयोग करने , सस्ते , वेंटीलेटर, सेनेटाइजर टनल ,पीपीई कीट, बनाने की बात कर रहें हैं, सेनेटाइजर और मास्क सड़कों पर बिक रहे हैं

यह कटु सच हैं कि गली में लम्बे समय से fair & lovely को  fresh & lovely , Lifeboy को Lifebody और Dora को  Dara कह कर गरीब लोगों को अमीरी के शौक बेच कर गली का लाल हो रहा लाला भी गरीब के चुल्‍‍हे की आंच जलाऐ रखता हैं, पर आज इलाज के नाम पर सम्‍मानीय पेशे में मुनाफखोरी का दीमक लग गया हैं, इलाज के नाम पर खतरनाक रसायनिक दवाई के की बाढ आ गई हैं, स्‍वयं चिकित्‍सक इलाज के नाम पर मरीज की नब्‍ज के बजाय जेब टटोल रहा हैं, संवेदना की खाट पर लि‍टाने के बजाय इलेक्‍टानिक उपकरणो की तार में लपेट देना ज्‍यादा लाभकर समझता हैं, सोचिऐ क्‍या हर किसी को डा‍क्‍टर मैं हूं कि आप सा टका सा जबाब देने वाली चिकित्सक की जानकारी के बिना आक्‍सीजन के सिलेण्‍डर मरीज को लगाया जा सकता हैं, गुणवत्ताविहिन वेटिंलेटर अस्‍पताल में आ सकता हैं , स्‍तरहीन टेस्‍ट कीट का प्रयोग किसी प्रयोगशाला में हो सकता हैं कतई नही राजनैतिक निर्णय हो सकते हैं पर दबाब नहीं चिकित्‍साजगत की अपनी एक कसौटी हैं जिस पर स्‍वय चिकित्‍सक को ही अपने पेशे का रगडना हैं और गुणवत्ता निर्धारित करनी हैं कटु सच ही तो हैं कि अगर डायबीटिज्‍ की बीमारी के लिऐ दवा पर गर कोई सफल अनुसंधान कर ले तो चिकित्‍सा का नोबेल पुरष्‍कार भी उसके सम्‍मान में कम होगा, डायबीटिज् का विश्‍वव्‍यापी कितना बडा बाजार हैं, और इसके शर्तिया इलाज की कितने सालों से कितनी बडी किमत चुका जा रही हैं कल्‍पना से परे हैं......

आपने गिनी पिग्स का नाम तो सुना होगा। यह चूहों की परिवार की प्रजाति होती है इन्हें प्रयोगशालाओं में दवाओं, घातक रसायनों के प्रयोग के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

इस समय कोरोना से संक्रमित मरीज ही नहीं हम सब की हालत गिनी पिग्स जैसी हो चुकी है।

हर कंपनी चाहती है कि इस अवसर का फायदा उठाने में नित नये आश्वासन बेच कर धन बटोरने में लगा हैं ,सवाल जीवन से जुड़ा हैं इसलिऐ गाहे-बगाहे सबकी दुकान चल रही हैं , तमाम खाद्य और औषधीय मापदंडों को तिलांजलि दे दी गई हैं, ताजा उदाहरण करोना के लेकर...

प्रधानमंत्री मोदी का करीबी समझा जाने वाला एक जइी बूटी व्यापारी और पतंजलि कंपनी का मालिक रामदेव भी अवसर का लाभ उठा रहा है। इंदौर के कलेक्टर मनीष सिंह ने कल रामदेव की एक आयुर्वेदिक दवा को कोरोना मरीजों पर परीक्षण करने की अनुमति दी है।

कलेक्टर महोदय बयान दे रहें हैं पतंजलि रिसर्च फाऊंडेशन के प्रस्ताव को अनुमति देते हुए एक एमबीबीएस डॉक्टर और एक आयुर्वेदिक डॉक्टर की निगरानी में परीक्षण की अनुमति दी गई है। वो भी सिर्फ और सिर्फ 48 घंटे में ,

कलेक्टर कौन होता है अनुमति देने वाला ?

भारत का क्लीनिकल ट्रायल नियम कहता है कि इसकी अनुमति स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया देगा।

ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया की एथिक्स कमेटी पूरे परीक्षण की निगरानी रखेगी और गिनी पिग बने मरीज की मौत या शारीरिक नुकसान होने पर उसे मुआवजा दिया जाएगा।

यह कैसा खिलवाड़ हैं ? अगर रामदेव की दवा खाकर मरीज की मौत हो जाती है तो प्रशासन उसे कोरोना से मौत मानकर मुर्दे को सीधे जला देगा,

निश्चित तौर पर हमारे निर्धारित मापदंड बंदर के हाथ उस्‍तरे वाले ही हैं,   

Wednesday, May 6, 2020

करोना से दोस्ती ही बेहतर ....


वैसे तो करोना ने जनवरी में ही दस्तक दे दी थी, हमारी बेरूखी पर उसने चीन,इटली ,अमेरिका जैसे विकसित देशों में अपना तांडव भी दिखाया, अंततः दुबके हुए हैं , तमाम संसाधन, संगठन , अनुसंधान, अनुष्ठान सब फेल ....करोना के लगातार बढ़ते संक्रमण से निकट भविष्य में किसी करोना हमारे भी गले पड़ ही गया,पिछले दो माह से हमारी तमाम मान-मनौव्वल से बेपरवाह करोना अपने लगातार पैर पसार रहा हैं , आज पुरा विश्व नीरीह प्राणी बन हाथ पर हाथ धरे बैठा हैं,तमाम सुपर पावर जल से आकाश तक बिजली की गति से शिकार करने वाले भी मुंह छुपाए तरह का भी छुटकारा मिलने की उम्मीद नहीं हैं, हमारे देश के लिऐ इस वायरस का यह सुखद अनुभव ही हैं की अभी तक अन्य संक्रामक बीमारी की अपेक्षा कम जानलेवा रहा हैं कई लोग तो अनजाने में ही इसके शिकार होकर ठीक भी हो गये, दरअसल पिछले कुछ वर्षों से हम लगातार किसी ना किसी वायरस की चपेट में आ रहें हैं पर बाजार की भाषा में करोना अपनी माकेटिंग ज्यादा ही सफल रहा , हेपेटाइटिस,मलेरिया,टी वी, इन्सेफेलाइटिस, डायरिया जैसी बीमारीयों में अपेक्षाकृत मौत के आंकड़े और ही भयावह हैं , इसलिए ये जरूरी हो जाता हैं की करोना को लेकर कुछ सकारात्मक सोच भी बनाई जाय , इस वायरस की वजह से निश्चय ही हम पारिवारिक हुऐ हैं हमने अपने परिवार को ज्यादा समय दिया, हमनें अभाव और बेबसी के लिए सहयोग के साथ बढ़ाए, हमारी विलासिता भी कम हुई हैं,अध्यात्म के नाम पर चल रहे आडंबरों को किनारे लगाया ,जन्म से मौत तक की औपचारिकताओं के बंधन तोड़ , थोड़ा हैं थोड़े की जरुरत में समेटा, हमारी घरेलू ,पारिवारिक रुचि और योग्यता को पहचान मिली, हम प्रकृति , पर्यावरण, समाज,और परिवार के लिऐ मर्यादित हुए,स्कूल कालेज बुनियादी योग्यता का महत्व समझा रहें है ,हम महसूस कर रहें हैं कि पशु पक्षी फिर हम से जुड़ रहें हैं चिड़ियों का चहचहाना बढ़ा हैं , नदी-तालाब का पानी साफ हुआ हैं , हवाओं में शुद्धता हैं आकाश साफ है,करोना संकट हमारी अनावश्यक आपाधापी को भी कम किया हैं, हमारी जरूरतें कम हुई हैं, हमें अनुशासन सिखाया हैं है हमारी सीमाएं निर्धारित की है , हमें भीड़ से छुटकारा दिलाया हैं , हमारी आपकी बातों में हवा-हवाई और स्पर्धा कम होकर आवश्यकताओं और मेहनत में संतुलन के प्रयोग हो रहें हैं, हमारे लिए अस्पताल, माल, सिनेमा और धार्मिक स्थलों की उपयोगिता कम हुई हैं, अस्पतालो आपरेशन कम हो रहें हैं , सीजेरियन डिलीवरी पर अंकुश,हार्ड अटैक के केश कम हैं , अपराध कम , दुर्घटनाएं कम ,पूजा अर्चना, सत्संग कीर्तन, का महत्व कम, ऐसा नहीं की बीमारी नहीं है, बच्चे पैदा होने रुख गये, ईश्वर नहीं हैं , दरअसल हमारा अंकगणित वरीयताएं निर्धारित करने में लग गया हैं , रोजगार कम हुआ हैं , उत्पादन कम हुआ हैं तो निश्चय ही हमारी आवश्यकताओं पर भी आत्ममंथन होगा ,जिसका मुलयांकन हमें स्वयं करना होगा , चुकीं निकट भविष्य में करोना के खत्म होने की कोई संभावना नहीं है तो बेहतर हैं लड़ने, जीतने जैसे राजनैतिक बयानों के बजाय इसकी शर्तों से समझोता करना चाहिए..! यकीन मानिए देश की करोना से ज्यादा शातिर हैं ,हम करोना से बच कर भी सत्ता की राजनीति से घुट घुट कर मर रहें हैं, इसके वैक्सीन बेहतर इलाज के आश्वासन उतने ही सही हैं जितने बाजार में बिक रहे सेनेटाइजर और मास्क कभी मानक मापदंडों पर परीक्षण तो कराइए, निसंदेह करोना के लिऐ अगर सोशल डिस्टेंस जरुरी हैं तो बचिए अनावश्यक भीड़ से , प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिऐ जैविक खेती करिए, व्यवसायिक स्पर्धा से कम करके ब्लड प्रेशर और डायबिटीज से छुटकारा पाये ...सतीश कुमार चौहान भिलाई 9827113539.

Tuesday, May 5, 2020

करोना से दोस्ती ही बेहतर 


करोना ने जनवरी में ही दस्तक दे दी थी, हमारी बेरूखी पर उसने चीन,इटली ,अमेरिका जैसे विकसित देवैसे शों  में अपना तांडव भी दिखाया, अंततः करोना हमारे भी गले पड़ ही गया,पिछले दो माह से हमारी तमाम मान-मनौव्वल से बेपरवाह करोना अपने लगातार पैर पसार रहा हैं , आज पुरा विश्व नीरीह प्राणी बन हाथ पर हाथ धरे बैठा हैं,तमाम सुपर पावर जल से आकाश तक बिजली की गति से शिकार करने वाले भी मुंह छुपाए दुबके हुए हैं , तमाम संसाधन, संगठन , अनुसंधान, अनुष्ठान सब फेल ....करोना  के लगातार बढ़ते संक्रमण से निकट भविष्य में  किसी तरह का भी छुटकारा मिलने की उम्मीद नहीं हैं, हमारे देश के लिऐ इस वायरस का यह  सुखद अनुभव ही हैं की अभी तक अन्य संक्रामक बीमारी की अपेक्षा कम जानलेवा रहा हैं कई लोग तो अनजाने में ही इसके शिकार होकर ठीक भी हो गये, दरअसल पिछले कुछ वर्षों से हम लगातार किसी ना किसी वायरस की चपेट में आ रहें हैं पर बाजार की भाषा में  करोना अपनी माकेटिंग ज्यादा ही सफल रहा , हेपेटाइटिस,मलेरिया,टी वी, इन्सेफेलाइटिस, डायरिया जैसी बीमारीयों में अपेक्षाकृत मौत के आंकड़े और ही भयावह हैं , इसलिए ये जरूरी हो जाता हैं की करोना को लेकर कुछ सकारात्मक सोच भी बनाई जाय , इस वायरस की वजह से निश्चय ही हम पारिवारिक हुऐ हैं हमने अपने परिवार को ज्यादा समय दिया, हमनें अभाव और बेबसी के लिए सहयोग के साथ बढ़ाए, हमारी विलासिता भी कम हुई हैं,अध्यात्म के नाम पर चल रहे आडंबरों को किनारे लगाया ,जन्म से मौत तक की औपचारिकताओं के बंधन तोड़ , थोड़ा हैं थोड़े की जरुरत में समेटा, हमारी घरेलू ,पारिवारिक रुचि और योग्यता को पहचान मिली, हम प्रकृति , पर्यावरण, समाज,और परिवार के लिऐ मर्यादित हुए,स्कूल कालेज बुनियादी  योग्यता का महत्व समझा रहें है ,हम महसूस कर रहें हैं कि पशु पक्षी फिर हम से जुड़ रहें हैं चिड़ियों का चहचहाना बढ़ा हैं , नदी-तालाब का पानी साफ हुआ हैं , हवाओं में शुद्धता हैं आकाश साफ है,करोना संकट हमारी अनावश्यक आपाधापी को भी कम किया हैं, हमारी जरूरतें कम हुई हैं, हमें अनुशासन सिखाया हैं है हमारी सीमाएं निर्धारित की है , हमें भीड़ से छुटकारा दिलाया हैं , हमारी आपकी बातों में हवा-हवाई और स्पर्धा कम होकर आवश्यकताओं और मेहनत में संतुलन के प्रयोग हो रहें हैं, हमारे लिए अस्पताल, माल, सिनेमा और धार्मिक स्थलों की उपयोगिता  कम हुई हैं, अस्पतालो आपरेशन कम हो रहें हैं , सीजेरियन डिलीवरी पर अंकुश,हार्ड अटैक के केश कम हैं , अपराध कम , दुर्घटनाएं  कम ,पूजा अर्चना, सत्संग कीर्तन, का महत्व कम, ऐसा नहीं की बीमारी नहीं है, बच्चे पैदा होने रुख गये, ईश्वर नहीं हैं , दरअसल हमारा अंकगणित वरीयताएं निर्धारित करने में लग गया हैं , रोजगार कम हुआ हैं , उत्पादन कम हुआ हैं तो निश्चय ही हमारी आवश्यकताओं पर भी आत्ममंथन होगा ,जिसका मुलयांकन हमें स्वयं करना होगा , चुकीं निकट भविष्य में करोना के खत्म होने की कोई संभावना नहीं है तो बेहतर हैं लड़ने, जीतने जैसे राजनैतिक बयानों के बजाय इसकी शर्तों से समझोता करना चाहिए..! यकीन मानिए देश की करोना से ज्यादा शातिर हैं ,हम करोना से बच कर भी सत्ता की राजनीति से घुट घुट कर मर रहें हैं, इसके वैक्सीन बेहतर इलाज के आश्वासन उतने ही सही हैं जितने बाजार में बिक रहे सेनेटाइजर और मास्क  कभी मानक मापदंडों पर परीक्षण तो कराइए, निसंदेह करोना के लिऐ अगर सोशल डिस्टेंस जरुरी हैं तो बचिए अनावश्यक भीड़ से , प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिऐ जैविक खेती करिए, व्यवसायिक स्पर्धा से कम करके  ब्लड प्रेशर और डायबिटीज से छुटकारा पाये .....

Tuesday, April 28, 2020

कराेना ..... हफते में दो रविवार होना चाहिये


करोना को लेकर कुछ सकारात्मक पोस्ट भी पढ़ने को मिल रही हैं ,मोर,हाथी,शेर का सड़कों पर आना,साफ बादलों में टिमटिमाते तारे दिखना,नदीयों का साफ होना, चिड़ियों का आंगन में घुमना, हम आपका परिवार के साथ ज्यादा समय देना,घर के कामों में हाथ बंटाना,रसोई में नये नये प्रयोग,आफिस का तनाव से राहत ....कुल मिलाकर आडम्बरो यह से किनारा, हर हाल में जीने से समझोता . दरअसल हम फिर प्रकृति के करीब ही आ गये, जानवरों ने हम पर विश्वास कर लिया,घर की चारदिवारी और छत भी धड़कने लगी, जीवन के सवाल पर अर्थ लाभ की सोच चरमरा गई हैं, वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर करोना वायरस का स्वतंत्र जीवन दो सप्ताह का ही है जिस पर हम आप विजय हासिल करेंगे ही,पर क्या बेहतर नहीं की प्रकृति ने जिस तरह हमें पेड़,पौधे,हवा,पानी ,जीव जंतु से पुनः एक बार साथ जोड़ने का काम किया हैं ,जिससे वातावरण में स्वच्छता और ताजगी आई है,जो परजीवी जीवाणु ,रोगणु और विषाणुओं करीब फटकने नहीं देती , इसे क्यों ना बनाया रखा जाए,जब ज्ञान विज्ञान, अनुसंधान, भगवान से बेहतर काम हमारे लाक डाउन से ही हो सकता हैं तो क्यों ना हम इको सन्तुलन को बनाए रखते हुए यह प्रण लें कि हमेशा लिऐ हफ्ते एक नहीं दो रविवार मनाएंगे, परिवार के साथ घर की चारदीवारी में ही रहेंगे ,ना वायु प्रदूषण ना ध्वनि प्रदूषण ,ना जल प्रदूषण.वो ही जानवर नदिया तारे अपनी आने वाली पी‍ढीयो को दिखा सके ....

Sunday, November 15, 2015

बी जे पी की मुसीबत, राज्या सभा

आत्ममुग्ध मोदी जी को बिहार चुनाव परिणाम के बाद विदेश जाने से पहले देश की जनता के सामने आकर बिहार के चुनाव परिणामो को सर आंखो पर लेते हुऐ बिहार की जनता को धन्यावाद देना चाहिये था की उन्होखने समय रहते तमाम लालच और भय को दरकिनार कर अपने विवेक से मोदी जी को यथा र्थ के धरातल पर ला दिया, इससे मोदी की मीडियाई छबि भी बरकरार रहती और आडवानी, मुरली मनोहर जोशी , अरुण शौरी, शत्रुघन सिन्हाी, यशवंत सिन्‍‍हा और आदी आदी के मुहं भी न खुलते, साथ ही कम से कम पार्टी के अंदर की बाते सार्वजरनिक भी न होती, सा‍थ ही नमस्तेी लंदन के दौरे में भी विदेशी मीडिया रायता नही फैलाती, पिछले साल लोकसभा चुनाव के नतीजों के तत्काल बाद राहुल गांधी ने भी तो मीडिया के सामने आकर हार की जिम्मेदार अपने ऊपर ली ही थी. यह और बात है कि पूरी पार्टी उनके दामन को बचाने में लगी रही. मोदी जी को भी ये समझना ही होगा मई 2014 में बिहार के लोगों ने नरेंद्र मोदी के एक सुर मोदी मोदी मोदी किया ही था । जिस बिहार ने मई 2014 में जातिय बंधन तोड़ उन्हें जिताया था वे यदि इतनी जल्दीद वापिस जात के समीकरण में कैसे लौट गऐ , कैसी नाराजगी हैं, भाजपा के लोग आत्ममंथन किये बिना आज मोदी अमित शाह को बचाने के लिऐ इतने उतावले हो गऐ हैं कि वे बिहार की जनादेश का सम्माअन करने के बजाय बिहार के लोगो को ही गुमराह व जातिवादी कह रहे हैं , मतलब लोकसभा के मी‍ठे अंगूर एकाएक खटटै हो गऐ हैं, केद्र में काबिज भाजपा को भी ये सोचना ही चाहिये कि 18 महीने जैसे राज चला, प्राथमिकताएं जैसी रहीं, जैसे चेहरे रहे, जैसे राजनैतिक तेवर रहे, बुनियादी जरूरतो का जो हाल हुआ, वह आम मतदाता को प्रभावित न कर सका, दरअसल भारत को गुजरात समझना एक बडी भूल हैं, गुजरात में जिस अफसरशाही, सिस्टम के बूते 12 साल राज चला, वैसा भारत के पैमाने पर संभव नहीं है। भारत न बौनों से चल सकता है और न अफसरों से। उसके लिए जमीनी-लोकप्रिय करिश्माेई नेताओं की भीड़ और सियासी कौशल चाहिए। उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल और पूरा भारत को काबू में रखने के लिऐ असली दमदार व जनता-पार्टी-कार्यकर्ताओं की नब्ज जानने वाले नेताओं की केंद्र और प्रदेशों में हैसियत की जरूरत होगी , जो 18 महीनो में प्रादेशिक स्तिर पर कही दिखी नही, नरेंद्र मोदी के साथ से समस्या है कि उन्होंने 18 महीने सबकुछ अपने एक चेहरे से साधना चाहा। अपने इर्द-गिर्द बौनों, पिग्मियों को रखा ताकि सब उन्हें देखते रहें। इस एप्रोच से मुख्यमंत्री तक का राज चल सकता है लेकिन सवा अरब लोगों के भारत के पैमाने का नहीं। न ही दो करोड़ अफसरों, उद्योगपतियों-कारोबारियों के मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया के जुमलों से एक अरब 27 करोड़ लोगों की भावनाएं जुड़ी रह सकती हैं। गरीब को गरीब की भाषा चाहिए, किसान को किसान की, हिंदू को हिंदू की भाषा और वह भी उसकी बोली, उसके अंदाज में। मोदी भक्तक भी मानें या न मानें बिहार की प्रकृति नरेंद्र मोदी को समझाने की कोशिश की ही है। बदलने का काम सोच में, फैसलों में, मंत्रियों में, चेहरों में, व्यवहार, कार्यशैली और प्राथमिकताओं में होना चाहिए। इस सवाल का जवाब भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में मिल जाए, इसकी उम्मीद बहुत कम ही रहती है. हर जीत के बाद श्रेय लेने के लिए बड़े नेता तो सामने आते हैं. लेकिन हार के बाद परिस्थितियां बदल जाती हैं. उसी बड़े चेहरे को बचाने की जद्दोजहद चलने लगती है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत का सेहरा नरेंद्र मोदी के सिर बंधा था. लेकिन बिहार की हार के लिए बीजेपी संसदीय बोर्ड ने कह दिया कि ये पार्टी की नाकामी है, मोदी की नहीं. आखिर इस जंग के सेनापति तो वही थे. लेकिन हार को लेकर स्वयं मोदी ने सार्वजनिक तौर कुछ नहीं कहा और तो और बजाय सामने आने के वे भाइे के 600 गाने बजाने वालो के साथ लंदन के वेम्बेनल में अपनी चमत्का री छबि बनाने की मुहिम में चले गऐ, सत्तां में भारी बहुमत से काबिज भाजपा अभी भी इस बात से बेपरवाह हैं कि संसद आज भी विपक्ष के रहमोकरम पर चल रही हैं , दिल्लीे, बिहार के चुनाव परिणाम अगर आगे के विधानसभा चुनावो में भी दोहराये जाते हैं तो सरकार के लिऐ राज्य,सभा की मुसीबत से निकलना और मुश्किल हो जाऐगा ...... .सतीश कुमार चौहान 9827113539

Friday, November 6, 2015

शाहरुख खान भी देश के विकास में योगदान देने वाला उद्वोग हैं

शाहरुख खान भी देश के विकास में योगदान देने वाला उद्वोग हैं ........................इन्टॉलरेंस जैसे गैरवाजिब विषय पर हो रही अनावश्य क बयानबाजी में देश के महत्व.पूर्ण बॉलीवुड सुपरस्टार बादशाह, लाखों करोड़ों दिलों की धड़कन बन चुके शाहरुख खान, जो आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक हर उम्र के लोग उनकी फैन लिस्ट में शामिल हैं। खासतौर पर आज के युवा वर्ग पर उनका जादू सर चढ़कर बोलता है। आखिर आ फंसे हिन्दूरत्व की बहस में सोमवार को अपने 50वें बर्थडे पर शाहरुख खान ने एक पत्रकार द्वारा सम्मांन लौटाने वाले सवाल के जबाब देश के माहौल को लेकर चिंता जताई थी। शाहरुख ने कहा था, ''देश में इन्टॉलरेंस बढ़ रहा है। ऐसे में, अगर मुझे कहा जाता है तो एक सिम्बॉलिक जेस्चर के तौर पर मैं भी अवॉर्ड लौटा सकता हूं।'' शाहरुख ने कहा, ''भारत में कोई देशभक्तं सेक्युलरिज्म के खिलाफ जाकर सबसे बड़ी गलती करता है। हम कितना भी विचारों की आजादी की बात कर लें, लेकिन कुछ कहने पर लोग मेरे घर के बाहर आकर पत्थर फेंकने लग जाते हैं। लेकिन हां, अगर कभी किसी मुद्दे पर स्टैंड लेना होगा, तो मैं उस पर डटा रहूंगा।'' इस बात को कुछ मीडियापरस्त राष्ट्रावादीयो ने लपक लिया और हाय तौबा मच गई, योग के साथ जडी बूटी के बडे कारोबारी रामदेव ने शाहरुख की देशभक्ती पर सवाल उठाते हुऐ कहा कि उन्हें यूपीए की सरकार के दौरान 2005 में पद्मश्री सम्मान मिलने के बाद की अपनी सारी कमाई दान कर देनी चाहिए या फिर पीएम राहत कोष में डाल देनी चाहिए। नहीं तो हम समझेंगे कि जिसकी चाकरी करके उन्होंने अवॉर्ड पाया, उसे ही खुश करने के लिए शाहरुख खान असहिष्णुता की बात कर रहे हैं।’ इसी तरह के अतिमहत्वरकांक्षी बीजेपी महासचिव और मध्यकप्रदेश के पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने ट्रिवट किया कि खान रहते भारत में हैं, पर उनका मन सदा पाकिस्तान में रहता है। उनकी फिल्में यहां करोड़ों कमाती हैं, पर उन्हें भारत असहिष्णु नजर आता है। यह देशद्रोह नहीं तो क्या है? भारत में असहिष्णुता का माहौल बनाना षड्यंत्र का हिस्सा है। शाहरुख का असहिष्णुता का राग पाक व भारत विरोधी ताकतों के सुर में सुर मिलाने जैसा है। जब 1993 में मुंबई में सैकड़ों लोग मारे गए, तब शाहरुख खान कहां थे? जब मुंबई पर 26/11 को हमला हुआ, तब शाहरुख कहां थे ?" वे भूल गऐ कि प्रतिभा के धनी शाहरुख के पिता ‍ताज मोहम्मद खान एक स्वतंत्रता सेनानी थे, देश के लिऐ उनके खून को भी मिटाया नही जा सकता ,इसी तरह हिन्दू त्वब की एक और पैरोकार विश्व हिंदू परिषद् नेता साध्वी प्राची ने कहा- शाहरुख खान को पाकिस्तानी एजेंट कह कर फरमान सुना दिया कि उसे पाकिस्तान ही चले जाना चाहिए। जैसा कि गोरखपुर से बीजेपी सांसद आदित्यनाथ ने कहा कि शाहरुख और आतंकी हाफिज सईद की भाषा में कोई फर्क नहीं है। आदित्यनाथ ने कहा, ''इस देश का बहुसंख्यक समाज अगर उनका बहिष्कार कर देगा तो उन्हें भी आम मुसलमान की तरह भटकना होगा। किंग खान के बचाव में लालू और केजरीवाल के अलावा शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा- देश टॉलरेंट है। मुस्लिम भी टॉलरेंट हैं। शाहरुख खान को सिर्फ इसलिए टारगेट नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वे मुस्लिम हैं। शाहरुख इसलिए सुपरस्टार हैं क्योंकि उन्होंने कभी धर्म का इस्तेमाल नहीं किया। शाहरुख को बहस में नहीं घसीटा जाना चाहिए। गोमांस रखने के शक पर दादरी में एक शख्स की हत्या और कन्नड़ लेखक कलबुर्गी के मर्डर के बाद अवॉर्ड वापसी की शुरुआत हुई। तब से 40 से ज्यादा लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाए हैं।, 13 इतिहासकार और कुछ वैज्ञानिकों ने भी राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाए हैं।,दिबाकर बनर्जी जैसे 10 फिल्मकारों ने नेशनल अवॉर्ड लौटाए हैं।अभिनेत्री शबाना आजमी तो आहवान ही कर दिया "देश में इन्टॉलरेंस बढ़ रहा है। हम सभी को सिम्बॉलिक जेस्चर के तौर पर अवॉर्ड लौटाने चाहिए, इतिहासकार इरफान हबीब तो संवैधानिक सीमाऐ लांघते हुऐ कह दिया कि इस्लामिक स्टेट और आरएसएस में ज्यादा फर्क नहीं है। इन घटनाओ और बयानो के बीच जब देश की असहिष्णुता पर समूचा देश पीएम मोदी को सुनना चाहता हैं, तब जब देश के यही पी एम विदेश में घूम घूम कर देश के अर्थव्यस्था और व्यापार की बात करते हैं. प्रजातांत्रिक ताने बाने, धर्मनिरपेक्षता की गंगा जमुनी तहजीब घुली मिली बेमिसाल एकता का मिसाल दे देकर विदेशी निवेश लाने का प्रयास कर रहे हैं जिससे देश में रोजगार के अवसर पैदा हो सके, देश विकास के पथ पर गतिमान हो सके, ठीक तब तो देश में प्रजा तंत्र के देश के सयाने कहे सत्ताप के जनप्रतिनिधियो को भी अपने बयानो से माहौल खराब करने के बजाय संभालने का प्रयास करना चाहिये न कि शाहरुख को पाकिस्तान भेजने की बात करे, आपको पता है कि उनकी वजह से कितने लोगों को रोज़गार मिलता है. मैं कहता हूँ कि शाहरुख ख़ान जैसे लोग अपने आप में उद्योग हैं." कल सलमान परसो आमीर आपके राडार पर होगा क्योाकी मुस्लहमान हैं प्रजातंत्र में समर्थको के सर गिनकर ही नितिनिर्धारक बन किसी का देश निकाला किया जा सकता हैं तो कर लो तुलना सिर्फ और सिर्फ पांच साल के लिऐ किसी कस्बेर जा जिले के तीस चालीस फिसदी लोगो लोगो अपेक्षा अभिनेताओ की सालो साल चलने वाली इनकी बेशुमार दिवानगी , टैक्से की रकम और रोजगार के अवसर से जो किसी उद्वोग से कम नही हैं , जिसका देश के विकास में योगदान को झुठलाया नही जा सकता ................ सतीश कुमार चौहान 98271 13539