हम वह आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखें हैं.बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग देखी, मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है। जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को देख कर घर भाग जाते थे,समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे
Wednesday, August 12, 2026
आखिरी पीढ़ी
बटवारा...
बटवारे के समय मैं नहीं था, सत्तर के दशक में ऑल इंडिया रेडिओ की उर्दू सर्विस के कार्यक्रम आवाज दे कहाँ हैं..को सुन कर हिंदुस्तान पाकिस्तान के बटवारे का दर्द दिमाग को झकझोड़ने के लिये काफी हैं आज की राजनीति और इसके सयाने सिर्फ और सिर्फ लोकलूभवानी बातें कर देश, समाज, धर्म के नाम पर लोगों को बाटने में लगे हैं. उस समय सम्पर्क की कोई बेहतर तकनीक तो थी नहीं 15 अगस्त 1947 को नेताओं ने फरमान सुनाया और देश टुकड़ो में बट गया, चाहे अनचाहे लोग भी बट गये.... मैं रेडिओ सुनने का शौकीन था. दोपहर 3 बजे प्रसारित इस कार्यक्रम में दोनों मुल्क के लोग बड़े भावनात्मक खत लिखते थे. स्याही में खून और आंसू होता था खत काफी मार्मिक होते थे. लोगों के दोस्ती के रिश्ते के किस्से कहानियाँ सुन कर कई बार तो रेडिओ श्रोता ही नहीं कई बार उद्घोषक भी रो पड़ते थे...जैसा की कार्यक्रम का नाम ही था "आवाज दे कहाँ हैं " बिछड़े लोगों के बिताये पलों का दर्द और अपील फिर जख्म पर मरहम का काम करता मधुर गीत... खास सुखद बात ये रहीं की सैकड़ो लोग कार्यक्रम को सुन कर मिल भी गये जो आज भी बघाबार्डर पार करते हैं .पिताजी भी रेडिओ में ये कार्यक्रम सुन कर भावुक हो जाते थे, उर्दू भी पाठ्यक्रम में थी . हमारे पूर्वज करनाल हरियाणा में रहते थे जिन्होंने इस दर्द को झेला..कुछ पड़ोसी भी बटवारे में चले गये जिनसे हमारा कटोरी का रिश्ता था सुख दुख में सर्फ, शक्कर, तेल, कटोरी में आता जाता था... दरअसल आज भाईचारा ही नहीं बचा
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