हमारे आपके आस पास की बाते जो कभी गुदगुदाती तो कभी रूलाती हैं और कभी दिल करता है दे दनादन...

Wednesday, August 12, 2026

आखिरी पीढ़ी

 हम वह आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिक जेट देखें हैं.बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग देखी, मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है। जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को देख कर घर भाग जाते थे,समाज  के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे



जिन्होंने चिमनी, लालटेन, कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं।जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है जिन्होंने बिजली  कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है।
जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। तख़्ती पर सेठे की क़लम से लिखा है जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है.और घर में शिकायत करने पर फिर मार खाई है
जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है जिन्होंने गुड़ की चाय पी है। सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है कभी कभी तो नमक / लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं। रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे कार्यक्रम सुने..

बटवारा...

 बटवारे के समय मैं नहीं था, सत्तर के दशक में ऑल इंडिया रेडिओ की उर्दू सर्विस के कार्यक्रम आवाज दे कहाँ हैं..को सुन कर हिंदुस्तान पाकिस्तान के बटवारे का दर्द दिमाग को झकझोड़ने के लिये काफी हैं आज की राजनीति और इसके सयाने सिर्फ और सिर्फ लोकलूभवानी बातें कर देश, समाज, धर्म के नाम पर  लोगों को बाटने में लगे हैं. उस समय सम्पर्क की कोई बेहतर तकनीक तो थी नहीं 15 अगस्त 1947 को नेताओं ने फरमान सुनाया और देश टुकड़ो में बट गया, चाहे अनचाहे लोग भी बट गये.... मैं रेडिओ सुनने का शौकीन था.  दोपहर 3 बजे प्रसारित इस कार्यक्रम में दोनों मुल्क के लोग बड़े भावनात्मक खत लिखते थे. स्याही में खून और आंसू  होता था खत काफी मार्मिक होते थे. लोगों के दोस्ती के रिश्ते के किस्से कहानियाँ सुन कर कई बार तो रेडिओ श्रोता ही नहीं कई बार उद्घोषक भी रो पड़ते थे...जैसा की कार्यक्रम का नाम ही था "आवाज दे कहाँ हैं " बिछड़े लोगों के बिताये पलों का दर्द और अपील फिर जख्म पर मरहम का काम करता मधुर गीत... खास सुखद बात ये रहीं की सैकड़ो लोग कार्यक्रम को सुन कर मिल भी गये जो आज भी बघाबार्डर पार करते हैं .पिताजी भी रेडिओ में ये कार्यक्रम सुन कर भावुक हो जाते थे, उर्दू भी पाठ्यक्रम में थी . हमारे पूर्वज  करनाल हरियाणा में रहते थे जिन्होंने इस दर्द को झेला..कुछ पड़ोसी भी बटवारे में चले गये जिनसे हमारा कटोरी का रिश्ता था सुख दुख में  सर्फ, शक्कर, तेल, कटोरी में आता जाता था... दरअसल आज भाईचारा ही नहीं बचा